31 दिसंबर 2019 - 13:16
नया साल आरंभ होने पर विशेष कार्यक्रम

प्राचीन परम्परा के अनुसार ईसाई पहली जनवरी को नये साल का पहला दिन मानते हैं।

हर नये साल के पहले दिन का आरंभ इस बात का सूचक होता है कि नये साल का आरंभ हो चुका है और कैलेन्डर में एक साल की वृद्धि हो जाती है। बहुत से लोग पुराने साल के समाप्त होने और नये साल के आरंभ होने की वजह से आज के दिन को जश्न मनाते हैं। आज नये साल यानी वर्ष 2020 का पहला दिन है। जिन देशों में ईसवी सन का प्रयोग होता है उनमें आम तौर पर पहली जनवरी को वर्ष का पहला दिन माना जाता है और जश्न मनाये जाते हैं। 31 दिसंबर की रात साल की आखिरी रात होती है और उसका  अगला दिन यानी पहली जनवरी नये वर्ष का पहला दिन होता है और लोग यूरोप, अमेरिका, आस्ट्रेलिया, एशिया और अफ्रीका सहित विश्व के बहुत से देशों में जश्न मनाते हैं जबकि नई संस्कृति में ईसाई देशों में साल के नये दिन पर पार्टियां होती हैं और लोग नये साल आरंभ होने की खुशी मनाते हैं।

ईरान की राजधानी तेहरान में दुकानों पर आजकल फूल, क्रिसमस का पेड़ और सजावट की दूसरी चीज़ों को देखा जा सकता है। वनक स्कावयर, बड़े- बड़े माल, जमहूरी रोड, सादी, नार्मक और मिर्ज़ा शीराज़ी जैसे तेहरान के वे क्षेत्र हैं जहां नये साल की चीज़ें अधिक मिलती हैं क्योंकि तेहरान के इन क्षेत्रों में काफी ईसाई रहते हैं। रोचक बात यह है कि बहुत से देशों में ईसाई होटलों में जश्न मनाते हैं जबकि ईरान और तेहरान में एसा नहीं है और ईसाई सहित दूसरे अल्प संख्यक अपने धार्मिक और ग़ैर धार्मिक कार्यक्रमों के आयोजन में पूरी तरह स्वतंत्र हैं और बहुत सी दुकानों पर यह सूचना लिखकर चिपका दी गयी है कि कहां पर और किस समय संगीत आदि का सीधा कार्यक्रम होगा। तेहरान में एक ईसाई महिला मुसलमानों के साथ नये साल का जश्न मनाये जाने पर खुशी के साथ कहती है” हमारे लिए क्रिसमस, ईदे पाक और शबे यल्दा या ईदे नौरोज़ के जश्नों में कोई अंतर नहीं है क्योंकि सब खुशी लाते हैं।"

हर चीज़ को कुछ प्रतीकों से पहचाना जाता है। नये ईसवी साल को क्रिसमस के जश्नों, क्रिसमस के पेड़ों और सांता क्लाज़ या क्रिसमस फादर से पहचाना जाता है। सांता क्लाज़ को सदियों पहले से इन दिनों का प्रतीक समझा जाता है। उसके बारे में बहुत कुछ कहा गया है। कुछ लोगों का कहना है कि ठंडक का पिता लाल रंग का वस्त्र धारण किये हुए है और उसकी सफेद लंबी दाढ़ी है और उसका स्थान क्रिसमस का पेड़ है यानी वह क्रिसमस के पेड़ के पास रहता है। सांता क्लाज़ हमेशा उपहार के साथ होता है और बच्चे हर वर्ष इस दयालु व्यक्ति की प्रतीक्षा करते हैं ताकि वह आकर उन्हें उपहार दे।

ईरान के ईसाई सालों से मुसलमानों के साथ घुल- मिलकर रहते आये हैं और ईरान की संस्कृति और कला में उनका योगदान है। ईरान में ईसाई मुख्य रूप से दो प्रकार के हैं। एक को अर्मनी जबकि दूसरे को आशूरी कहा जाता है और तेहरान, इस्फहान और तबरीज़ जैसे ईरान के बहुत से शहरों में रहते हैं। तेहरान में रहने वाले अर्मनी ईसाई एक विशेष प्रकार की मीठाई के साथ नये साल का जश्न मनाते हैं। 6 जनवरी को अर्मनी ईसाई क्रिसमस की ईद मनाते हैं जबकि विश्व के बहुत से देशों के ईसाई 25 दिसंबर को क्रिसमस ईद मनाते हैं अलबत्ता जो ईरान के आशूरी ईसाई हैं वे कैथोलिक हैं और वे भी 25 दिसंबर को ही जश्न मनाते हैं। यह जो अंतर है उसका मूल कारण हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के जन्म की तारीख़ के बारे में ईसाई संप्रदायों के मध्य मतभेद है। इसी प्रकार जो ईरानी अर्मनी हैं क्रिसमस के दिन उनका जो खाना होता है वह दूसरी जगह के ईसाईयों से भिन्न होता है। इसी प्रकार ईरानी अर्मनी यानी जो ईरानी ईसाई हैं 6 जनवरी को वे टर्की के बजाये चावल, एक विशेषकर प्रकार की सब्ज़ी और मछली खाते हैं और कुछ का मानना है कि उनके खाने में यह जो अंतर है वह ईरान की प्राचीन संस्कृति से प्रभावित है। संगीत

पहली जनवरी की आधी रात को गिरजाघर का घंटा बजता है। वह नये साल के आरंभ होने सूचक होता है। ठीक रात के 12 बजे अर्मनी ईसाई गिरोहों- गिरोहों में गिरजाघर में दाखिल होते हैं और जान- पहचान के हर ईसाई को नये साल की मुबारकबाद देते हैं। जवान लड़के और लड़कियां भी होते हैं और बच्चे खेलने कूदने में व्यस्त होते हैं किन्तु रात को 12 बजे गिरजाघर के घंटे की आवाज़ शहर में गूंजती है। सब चुप हो जाते हैं और आसमान की ओर देखते हैं और यह दुआ का समय होता है। गिरजाघर के प्रांगण में चहल- पहल होती है और गिरजाघर का जो मेहराब होता है उसमें पादरी और उनके जवान सहायक धार्मिक संस्कार अंजाम देते हैं। मोमबत्तियां और अगरबत्तियां जलती हैं और सब दुआ करते हैं।

ईरान में ईसाई धार्मिक अल्प संख्यक हैं और उनके पास भी आसमानी किताब इंजील हैं। पवित्र कुरआन के सूरे आले इमरान की आयत नंबर 64 में इस्लाम और ईसाई धर्म के संयुक्त बिन्दुओं के आधार पर ईसाईयों का आह्वान दोस्ती के लिए किया गया है। इसी प्रकार ईसाई और ज़रतुश्ती धर्म को ईरानी संविधान में मान्यता प्रदान की गयी है। ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई ने ईसाईयों के लिए जो संदेश दिया है उसमें आया है कि मुसलमान जो हज़रत ईसा का सम्मान करते हैं वह उस सम्मान से कम नहीं है जो ईसाई हज़रत ईसा का करते हैं।

6ठीं शताब्दी के अंत में इस्फहान, यज़्द, तेहरान, शीराज़ और मशहद जैसे नगरों में ईसाई धर्म फैला। मौजूद प्रमाणों के आधार पर आशूरी ईसाई शताब्दियों तक ईरान में रहे हैं। ईरान में ईसाई धर्म के आगमन के आरंभ से ही आशूरी इस धर्म के अनुयाई बन गये। ईरान की इस्लामी क्रांति की सफलता ने आशूरियों को नया संदेश दिया। वे भी दूसरे आधिकारिक धार्मिक गुटों की तरह प्राप्त स्वतंत्रता से लाभ उठा रहे हैं और अपनी धार्मिक और जातीय परम्परा को सुरक्षित किये हुए हैं और समाज में उसे प्रचलित कर दिया है। आशूरी ईसाईयों के जो विशेष स्कूल हैं उनमें आशूरी भाषा की शिक्षा देना पूरी तरह स्वतंत्र है। इसी प्रकार आशूरी ईसाई अपने धार्मिक और ग़ैर धार्मिक कार्यक्रमों के आयोजन में पूर्ण स्वतंत्र हैं। ईरानी ईसाई आशूरियों के 90 से अधिक गिरजाघर हैं। जो चीज़ आशूरी ईसाईयों के लिए सबसे अधिक गर्व का कारण है वह यह है कि जनसंख्या कम होने के बावजूद ईरानी संसद में उनका एक प्रतिनिधि होता है और उस सांसद को भी वही अधिकार प्राप्त होते हैं जो दूसरे सांसदों को प्राप्त हैं। यह एसी चीज़ है जो मध्यपूर्व और पश्चिमी देशों में अद्वितीय है।

एक ईरानी ईसाई श्री आतूचियान कहते हैं” हम ईसाई इस बात से बहुत खुश हैं कि ईरान में हम अपना धार्मिक कार्यक्रम आयोजित करने में पूर्णरूप स्वतंत्र हैं। मेरे विचार में शायद किसी भी देश में धार्मिक अल्प संख्यकों को वह सुविधायें व संभावनाएं प्राप्त नहीं हैं जो हम ईरानी ईसाईयों को प्राप्त हैं। ईरान वह जगह है जहां हमारे पूर्वज रहते थे। हम ईरान में प्राप्त आज़ादी को पश्चिम में प्राप्त आज़ादी पर प्राथमिकता देते हैं और ईरान के बारे में संचार माध्यम जो झूठ बोलते हैं उसे हम स्वीकार नहीं करते हैं। श्री आतूचियान आगे कहते हैं" अगर आज़ादी और मानवाधिकार वही निरंकुशता और अनैतिकता है तो हमें एसी आज़ादी नहीं चाहिये। ईरान में हमारा समाज छोटा किन्तु सक्रिय व ज़िन्दा समाज है और ईरानी मुसलमान भी हम पर भरोसा करते हैं।"

ईरान के अर्मनी भी बहुत पहले से इस देश में रह रहे हैं। एतिहासिक किताबों के अनुसार तीसरी ईसवी शताब्दी से पहले अर्मनी ईसाई ईरान में रह रहे हैं। दूसरी ओर आर्मीनिया में रहने वाले आर्मीनियाई ईसाईयों का संबंध ईरानियों से बहुत पुराना है। ईरान में अश्कानी शासन आरंभ होने के समय से ईरानियों और अर्मनियों के राजनीतिक और सामाजिक संबंध और मज़बूत हो गये। इसी प्रकार जब ईरान में शाह अब्बास के नेतृत्व में सफ़वी शासन का आरंभ हुआ तो अर्मनियों को इस्फहान, रश्त, क़ज़्वीन और शीराज़ ले जाया गया और वहां इन्हें बसा दिया गया। शाह अब्बास ने इसी प्रकार अर्मनी ईसाईयों को गिरजाघरों के निर्माण और उनके धार्मिक कार्यक्रमों के आयोजन की अनुमति दी। ईरान के इस्फहान नगर में वैन्क नाम का जो सबसे बड़ा और सुन्दर गिरजाघर है उसमें भी पहली जनवरी की आधी रात को नये साल के जश्न मनाये जाते हैं।

लेबनान के एक ईसाई लेखक व विश्लेषक सरकिस अबू ज़ैद हैं। उन्होंने अभी हाल ही में ईरान में ईसाईयों की स्थिति के बारे में एक किताब लिखी है। वह लिखते हैं” मेरे लिए यह बात बिल्कुल स्पष्ट है कि ईरानी समाज में ईरानी ईसाई सक्रिय हैं। ईरान में ईसाईयों के उपासना स्थल और दूसरे विशेष केन्द्र हैं। इसी प्रकार ईरानी संसद में ईसाई सांसद भी होता है जो विकसित सभ्यता का सूचक है। वह ईरान में धार्मिक अल्प संख्यकों की स्थिति के बारे में दुश्मनों के विशैले कुप्रचारों की ओर संकेत करते हुए आगे लिखते हैं” मैं ईरान गया और विभिन्न गिरजाघरों को देखा, विभिन्न ईसाई धर्मगुरूओं और पादरियों से मुलाकात की तब मुझे ईरान में ईसाईयों की सही स्थिति का पता चला। इस आधार पर और सच्चाई की सेवा के उद्देश्य से ईरान में ईसाईयों को जो आज़ादी प्राप्त है उसके बारे में मैंने “ईरान में ईसाईयत” नाम की एक किताब लिखी है।"

नया साल आरंभ हो चुका है। आशा है कि पूरी दुनिया में हज़रत ईसा अलैहस्सलाम के प्रेम और शांति का संदेश फैल जायेगा। इस बात को ध्यान में रखना चाहिये कि हज़रत ईसा मसीह अलैहिस्सलाम वह महान ईश्वरीय पैग़म्बर हैं जिन्होंने अनेकेश्वरवाद, अत्याचार, साम्राज्यवाद और पूंजीवाद जैसी चीज़ों से मुकाबला किया। इसी प्रकार उन्होंने लोगों को न्याय और प्रेम का निमंत्रण दिया ताकि वे आज़ादी और परिपूर्णता तक पहुंच सकें। ईसाई राष्ट्रों को चाहिये कि वे हज़रत ईसा मसीह अलैहिस्सलाम के संदेशों व शिक्षाओं पर अमल करें और ईसाई देशों की सरकारें वास्तव में हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की शिक्षाओं का अनुसरण करके विश्व के बहुत से लोगों की समस्याओं व पीड़ाओं को समाप्त कर सकती हैं। बहरहाल नये साल के अवसर पर एक बार फिर विश्व के समस्त ईसाईयों को मुबारकबाद पेश करते हैं और समस्त लोगों के लिए हिंसा व अत्याचार रहित विश्व और इसी प्रकार न्याय, प्रेम और शांति से भरे विश्व की कामना करते हैं।